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चेक बाउंस केस में क्या करें: धारा 138 नोटिस और समय सीमा

बाउंस हुआ चेक आपराधिक मामला बन सकता है, बशर्ते आप तय समय सीमाओं का सख्ती से पालन करें। जानिए धारा 138 की पूरी प्रक्रिया, चेक पाने वाले और देने वाले दोनों के लिए।

न्याय घर टीमप्रकाशित 6 मिनट में पढ़ें

इस मार्गदर्शिका में

अगर आपको दिया गया चेक बाउंस हो जाए, तो बैंक का रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के भीतर चेक देने वाले को लिखित कानूनी माँग नोटिस भेजें। नोटिस मिलने के 15 दिन में वह भुगतान न करे, तो उन 15 दिनों के खत्म होने के एक महीने के भीतर परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दायर कर सकते हैं।

बाउंस हुआ चेक सिर्फ पैसे का मामला नहीं है। परक्राम्य लिखत अधिनियम (नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट), 1881 की धारा 138 के तहत, कानूनी रूप से वसूली योग्य कर्ज या देनदारी चुकाने के लिए दिया गया चेक अनादरित होना अपराध हो सकता है। लेकिन यह कानून समय सीमाओं को लेकर बेहद सख्त है। एक भी तारीख चूकने से केस कमजोर हो सकता है या खत्म भी हो सकता है, इसलिए कदम उठाने से पहले पूरा क्रम समझ लेना ज़रूरी है।

धारा 138 कब लागू होती है?

धारा 138 आम तौर पर तब लागू होती है जब ये सारी बातें सही हों:

  • चेक किसी ऐसे कर्ज या देनदारी के भुगतान के लिए दिया गया हो जो कानूनी रूप से वसूली योग्य है, न कि उपहार या दान के रूप में।
  • चेक उसकी वैधता अवधि, यानी चेक पर लिखी तारीख से 3 महीने के भीतर बैंक में लगाया गया हो।
  • बैंक ने उसे बिना भुगतान लौटा दिया हो, जैसे खाते में पर्याप्त पैसे न होने या रकम तय सीमा से ज्यादा होने के कारण।
  • आपने समय पर लिखित माँग नोटिस भेजा हो और नोटिस मिलने के 15 दिन में भुगतान न हुआ हो।

अगर चेक सिक्योरिटी के तौर पर दिया गया था या कर्ज पर ही विवाद है, तो मामला उलझ सकता है। ऐसे सवालों पर शुरुआत में ही अधिवक्ता से बात कर लेना ठीक रहता है।

धारा 138 की समय सीमा एक नजर में

  1. चेक बैंक में लगाएँ: चेक की तारीख से 3 महीने के भीतर।
  2. रिटर्न मेमो लें: बैंक से चेक लौटने की वजह वाला मेमो प्राप्त करें।
  3. कानूनी माँग नोटिस भेजें: रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के भीतर चेक देने वाले से चेक की रकम माँगें।
  4. 15 दिन इंतजार करें: यह अवधि उस तारीख से गिनी जाती है जब चेक देने वाले को नोटिस मिला। इस दौरान पूरा भुगतान हो जाए तो अपराध नहीं बनता।
  5. शिकायत दायर करें: 15 दिन की अवधि खत्म होने के एक महीने के भीतर, धारा 142 के अनुसार मजिस्ट्रेट के सामने। देरी का पर्याप्त कारण दिखाने पर अदालत देर से आई शिकायत भी स्वीकार कर सकती है, पर इस पर निर्भर न रहें।

सावधानी: हर कदम की तारीख का रिकॉर्ड रखें: चेक पर लिखी तारीख, बैंक में लगाने की तारीख, रिटर्न मेमो मिलने की तारीख, नोटिस भेजने की तारीख और नोटिस पहुँचने का सबूत। पूरा मुकदमा इन्हीं तारीखों पर टिका होता है।

कानूनी नोटिस में क्या लिखा होना चाहिए?

माँग नोटिस लिखित में होना ज़रूरी है। आम तौर पर इसे पावती सहित रजिस्टर्ड डाक या स्पीड पोस्ट से भेजा जाता है, और अतिरिक्त सबूत के लिए बहुत से लोग ईमेल या कूरियर से भी भेजते हैं। इसमें ये बातें हों:

  • आपका नाम और चेक देने वाले का नाम-पता
  • चेक नंबर, तारीख, रकम और बैंक
  • वह कर्ज या देनदारी जिसके लिए चेक दिया गया था
  • चेक लौटने की तारीख और रिटर्न मेमो में लिखी वजह
  • नोटिस मिलने के 15 दिन के भीतर चेक की रकम चुकाने की साफ माँग

नोटिस की प्रति, डाक की रसीद और ट्रैकिंग या पावती कार्ड संभाल कर रखें। अगर नोटिस "लेने से इनकार" या "दावा न किया गया" लिखकर लौट आए, तो वह लिफाफा बिना खोले रखें। इसका आपके केस पर क्या असर होगा, यह अधिवक्ता बता सकते हैं।

मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दायर करना

कहाँ दायर करें: अगर चेक आपके बैंक खाते के ज़रिए जमा किया गया था, तो शिकायत उस अदालत में होगी जिसके क्षेत्र में आपकी बैंक शाखा है (धारा 142(2))। चेक देने वाला भुगतान न करे तो मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत के साथ ये लगाए जाते हैं:

  • मूल चेक और बैंक का रिटर्न मेमो
  • कानूनी नोटिस की प्रति और भेजने व पहुँचने का सबूत
  • मूल कर्ज के दस्तावेज़, जैसे लोन एग्रीमेंट, बिल, संदेश या बैंक ट्रांसफर
  • तथ्यों पर आपका हलफनामा

अदालत शिकायत पर संज्ञान लेकर आरोपी को समन भेजती है। मुकदमे के दौरान अदालत धारा 143ए के तहत आरोपी को चेक की रकम का 20% तक अंतरिम मुआवजा देने का आदेश दे सकती है।

चेक बाउंस की सजा क्या है?

दोषी पाए जाने पर धारा 138 में 2 साल तक की कैद, या चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है। असल नतीजा तथ्यों और अदालत के आकलन पर निर्भर करता है। बहुत से चेक बाउंस केस समझौते से खत्म होते हैं, क्योंकि कानून पक्षों को अपराध का शमन, यानी आपसी समझौता करने की अनुमति देता है।

अगर बाउंस हुआ चेक आपने दिया था

अगर चेक आपने दिया था, तो नोटिस को नजरअंदाज न करें। उसे ध्यान से पढ़ें और वह तारीख नोट करें जब नोटिस मिला, क्योंकि आपकी 15 दिन की मोहलत उसी दिन से शुरू होती है।

  • अगर रकम सच में बकाया है, तो नोटिस मिलने के 15 दिन के भीतर भुगतान करने से अपराध नहीं बनता।
  • पूरी रकम एक साथ न दे पाएँ, तो लिखित समझौते या किस्तों की बात करें।
  • अगर कर्ज पर ही विवाद है, जैसे चेक का दुरुपयोग हुआ या रकम पहले ही चुका दी गई, तो लिखित जवाब भेजें और तुरंत अधिवक्ता से बात करें।

आपराधिक शिकायत के अलावा और रास्ते

धारा 138 की शिकायत अकेला रास्ता नहीं है। हालात के हिसाब से आप पैसे की वसूली के लिए दीवानी मुकदमा भी कर सकते हैं, या मध्यस्थता और लोक अदालत का सहारा ले सकते हैं, जहाँ समझौता जल्दी और दोनों पक्षों के लिए कम तनाव वाला हो सकता है।

न्याय घर कैसे मदद कर सकता है

चेक बाउंस के मामले तारीखों और दस्तावेज़ों पर टिके होते हैं। अगर माँग नोटिस का मसौदा बनवाना हो, यह जाँचना हो कि आप समय सीमा के भीतर हैं या नहीं, या मिले हुए नोटिस का जवाब देना हो, तो आप कानूनी सहायता का अनुरोध कर सकते हैं और दीवानी और वसूली मामलों पर काम करने वाले अधिवक्ता से जुड़ सकते हैं। कानूनी खर्च की चिंता हो तो पढ़ें मुफ्त कानूनी सहायता कैसे मिलती है। अगर विवाद खरीदे गए सामान या सेवा से जुड़ा है, तो देखें उपभोक्ता शिकायत ऑनलाइन कैसे करें।

यह मार्गदर्शिका सामान्य कानूनी जानकारी है, आपके विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं।

न्याय घर टीम द्वारा संबंधित अधिनियमों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आधार पर, सामान्य जानकारी के लिए लिखी गई। कानून बदलते रहते हैं, इसलिए कोई कदम उठाने से पहले किसी योग्य अधिवक्ता से वर्तमान स्थिति जान लें।

आधिकारिक स्रोत

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चेक बाउंस नोटिस भेजने की समय सीमा क्या है?

बैंक का रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के भीतर लिखित माँग नोटिस भेजना होता है। गिनती उस दिन से करें जब मेमो असल में आपके हाथ आया, और उस तारीख का सबूत रखें।

क्या बाउंस हुआ चेक दोबारा बैंक में लगा सकते हैं?

हाँ, जब तक चेक अपनी 3 महीने की वैधता के भीतर है, उसे दोबारा लगाया जा सकता है। फिर 30 दिन की नोटिस अवधि उस रिटर्न मेमो से गिनी जाती है जिसके आधार पर आप कार्रवाई करते हैं।

क्या चेक बाउंस केस में समझौता हो सकता है?

हां। यह शमनीय अपराध है, इसलिए पक्ष अलग-अलग चरणों में, मध्यस्थता या लोक अदालत के ज़रिए भी, समझौता कर सकते हैं। अदालत में दर्ज लिखित समझौता सबसे सुरक्षित तरीका है।

अगर चेक देने वाला 15 दिन बाद भुगतान करे तो?

देर से भुगतान करने पर दायर हो चुका केस अपने आप खत्म नहीं होता, लेकिन अक्सर इससे समझौते का रास्ता खुलता है। कुछ भी वापस लेने से पहले अपने अधिवक्ता से बात करें।

इस कानूनी सेवा के बारे में जानें: दीवानी कानून

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