
दीवानी कानून
अधिकारों, धन, अनुबंधों या दायित्वों को लेकर पक्षों के बीच विवाद।
ज़रूरी समय-सीमाएँ और नंबर
- 3 साल
- पैसे और अनुबंध के कई दावे
- यह आम परिसीमा अवधि है। सही अवधि दावे के प्रकार पर निर्भर है, इसलिए जल्दी जाँच लें।
- 30 दिन
- चेक बाउंस का नोटिस
- बैंक का रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के भीतर माँग का नोटिस भेजना होता है।
- 1 महीना
- चेक बाउंस की शिकायत
- यह चेक देने वाले को भुगतान के लिए मिले 15 दिन बीतने के बाद गिना जाता है। पर्याप्त कारण होने पर अदालत देरी माफ़ कर सकती है।
परिचय
दीवानी (सिविल) कानून उन विवादों से जुड़ा है जो लोगों, कारोबारों या संस्थाओं के बीच पैसे, समझौतों, अधिकारों या ज़िम्मेदारियों को लेकर होते हैं। आपराधिक मामले से अलग, दीवानी मामले का मकसद आमतौर पर बकाया रकम वापस पाना, किसी वादे को पूरा करवाना या किसी गलत काम को रुकवाना होता है, और यह सिविल अदालत के आदेश से होता है।

इस क्षेत्र में क्या-क्या आता है
इस क्षेत्र में लोग अक्सर इस तरह के मामले लेकर हमारे पास आते हैं।
पैसे की वसूली
उधार, बकाया बिल और ऐसी जमा रकम जो दूसरा पक्ष नहीं लौटा रहा।
अनुबंध का टूटना
जब समझौते का पालन न हो, तब मुआवज़ा माँगना या वादा पूरा करवाने की माँग करना।
निषेधाज्ञा
किसी को कोई काम करने से रोकने वाले अदालती आदेश, जिनमें केस चलने के दौरान के अस्थायी आदेश भी शामिल हैं।
अनुबंध का पालन और घोषणा
अदालत से समझौता लागू करवाना या यह घोषित करवाना कि आपके कानूनी अधिकार क्या हैं।
बाउंस हुए चेक
बैंक से बिना भुगतान लौटे चेक के मामले में नोटिस और रकम की वसूली।
अपील और डिक्री का पालन
जिस डिक्री से आप सहमत नहीं उसे चुनौती देना, या जिसका पालन नहीं हुआ उसे लागू करवाना।
कब मदद की ज़रूरत पड़ सकती है
इनमें से कुछ भी जाना-पहचाना लगे, तो जल्दी मार्गदर्शन लेना मददगार हो सकता है।
- किसी ने आपसे उधार लिया और अब पैसे नहीं लौटा रहा
- खरीदार, विक्रेता या ठेकेदार ने लिखित समझौता तोड़ दिया है
- किसी को आपके अधिकार में दखल देने से रोकने के लिए अदालत का आदेश (स्टे) चाहिए
- आपको मिला चेक बाउंस हो गया है और आप रकम वसूलना चाहते हैं
मामला आमतौर पर कैसे आगे बढ़ता है
यह घटनाओं का सामान्य क्रम है। तथ्यों और आपके राज्य के अनुसार आपका मामला अलग हो सकता है।
- 1
कागज़ात और घटनाक्रम
- 2
लिखित माँग या कानूनी नोटिस
- 3
समझौते की कोशिश
- 4
मुकदमा दायर करना
- 5
सुनवाई, डिक्री और पालन

न्याय घर कैसे मदद करता है
अपनी बात बताने के बाद आप हमारी टीम से क्या उम्मीद कर सकते हैं।
मामले की समीक्षा
हम आपकी बात और कागज़ात पढ़कर समझते हैं कि असल विवाद किस बात का है।
विकल्पों की जानकारी
कानूनी नोटिस, बातचीत, मध्यस्थता, लोक अदालत या दीवानी मुकदमा, हर रास्ता हम सरल भाषा में समझाते हैं।
समय-सीमा पर नज़र
हम बताते हैं कि आपके मामले में कौन-सी परिसीमा अवधि लागू हो सकती है, ताकि देरी से आपका हक न छूटे।
वकील से संपर्क
जहाँ अदालत जाना ज़रूरी लगे, वहाँ हम आपको दीवानी मामलों के जानकार वकील से जोड़ते हैं।
ये दस्तावेज़ तैयार रखें
ये सब होना ज़रूरी नहीं। जो आपके पास है, वही बताएँ।
- लिखित समझौते, अनुबंध, कोटेशन या बिल
- रसीदें, बैंक स्टेटमेंट और भुगतान के अन्य सबूत
- दूसरे पक्ष के साथ हुई चिट्ठियाँ, ईमेल और चैट संदेश
- भेजा या मिला कोई भी कानूनी नोटिस, डिलीवरी के सबूत के साथ
इन गलतियों से बचें
छोटी-छोटी चूकें, जो बाद में मामले को मुश्किल बना सकती हैं।
- परिसीमा अवधि खत्म होने के करीब आने तक सलाह न लेना
- समन को अनदेखा करना, जिससे अदालत आपकी गैरमौजूदगी में कार्यवाही कर सकती है
- बड़ी रकम बिना लिखित रिकॉर्ड या रसीद के देना या उधार देना
- मूल कागज़ात फेंक देना या दूसरे पक्ष से हुए संदेश मिटा देना
आमतौर पर लागू होने वाले कानून
इस क्षेत्र से जुड़े मुख्य कानून, आसान भाषा में।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872
विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963
सामान्य प्रश्न
हर स्थिति अलग होती है। ये पृष्ठ इस क्षेत्र को सामान्य रूप से समझाते हैं; आपके मामले की समीक्षा उसके अपने तथ्यों के आधार पर होगी।
क्या दीवानी मुकदमे से पहले कानूनी नोटिस भेजना ज़रूरी है?
हमेशा नहीं। सरकार के खिलाफ मुकदमे (सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80) और चेक बाउंस जैसे मामलों में नोटिस ज़रूरी है; बाकी मामलों में भी नोटिस एक अच्छा पहला कदम है, जिससे कई बार समझौते का रास्ता खुलता है।
दीवानी केस कितने समय के भीतर करना होता है?
यह दावे के प्रकार पर निर्भर है। परिसीमा अधिनियम यह अवधि तय करता है, जो पैसे और अनुबंध के कई दावों में तीन साल है, इसलिए जल्दी जानकारी लेना बेहतर है।
क्या बिना लंबे मुकदमे के विवाद सुलझ सकता है?
हाँ। बातचीत, मध्यस्थता और लोक अदालत से कई दीवानी विवाद सुलझ जाते हैं। लोक अदालत का फैसला अंतिम होता है और उसमें कोर्ट फीस नहीं लगती।
क्या न्याय घर अदालत में मेरा केस लड़ेगा?
न्याय घर आपकी समस्या समझकर आपके विकल्प बताता है। जहाँ अदालत में पैरवी ज़रूरी हो, वहाँ हम योग्य वकील से जोड़ते हैं, और आगे की हर मदद आपकी सहमति से, साफ़ शर्तों पर तय होती है।

समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहाँ से करें? हमें बताइए क्या हुआ।
अपनी समस्या अपने शब्दों में लिखें। हमारी टीम उसे पढ़कर आपसे संपर्क करेगी।
