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एफआईआर कैसे दर्ज करें: थाने और ऑनलाइन की पूरी प्रक्रिया

थाने में या ऑनलाइन एफआईआर दर्ज कराने की आसान भाषा में जानकारी, पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी और उसके बाद होने वाली कार्रवाई।

न्याय घर टीमप्रकाशित 7 मिनट में पढ़ें

इस मार्गदर्शिका में

एफआईआर दर्ज कराने के लिए किसी भी थाने में जाकर थाना प्रभारी को घटना की जानकारी दें। यह जानकारी आप बोलकर, लिखकर या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दे सकते हैं। बीएनएसएस की धारा 173 के तहत संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करना, उसे पढ़कर सुनाना, आपके हस्ताक्षर लेना और मुफ्त कॉपी देना पुलिस की जिम्मेदारी है।

एफआईआर क्या होती है?

एफआईआर यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट वह पहला लिखित दस्तावेज़ है, जो पुलिस किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर तैयार करती है। इसी से आपराधिक कार्रवाई की शुरुआत होती है। एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस से उम्मीद की जाती है कि वह जाँच करे, सबूत जुटाए और तथ्यों के आधार पर अदालत में रिपोर्ट पेश करे।

एफआईआर पूरा मुकदमा नहीं है, बल्कि घटना के बारे में आपका पहला बयान है। इसके लिए आपको कानून की जानकारी होना, सही धाराएँ बताना या हर छोटी बात याद होना ज़रूरी नहीं। ज़रूरी यह है कि आप ईमानदारी से बताएँ कि क्या हुआ, कब हुआ, कहाँ हुआ और इसमें कौन शामिल था।

अब एफआईआर किस कानून के तहत दर्ज होती है?

1 जुलाई 2024 से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की जगह ले ली है। अब एफआईआर बीएनएसएस की धारा 173 (पुरानी सीआरपीसी धारा 154) के तहत दर्ज होती है। अपराधों की परिभाषा अब भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में है, जिसने आईपीसी की जगह ली है। अगर आपकी घटना 1 जुलाई 2024 से पहले की है, तो मामले के कुछ हिस्सों पर पुराने कानून भी लागू हो सकते हैं। ऐसे में किसी वकील से पूछ लेना बेहतर है।

संज्ञेय और असंज्ञेय अपराध: यह फर्क क्यों अहम है

संज्ञेय अपराध गंभीर श्रेणी के होते हैं, जैसे चोरी, चोट पहुँचाने वाली मारपीट, धोखाधड़ी या यौन अपराध। इनमें पुलिस बिना वारंट कार्रवाई और गिरफ्तारी कर सकती है। ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करना पुलिस की मर्ज़ी पर नहीं छोड़ा गया है। ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर सूचना से संज्ञेय अपराध का पता चलता है, तो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है।

असंज्ञेय अपराध अपेक्षाकृत कम गंभीर होते हैं। इनमें पुलिस सूचना को एक रजिस्टर में दर्ज करती है और आपको मजिस्ट्रेट के पास भेजती है। मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही पुलिस जाँच कर सकती है (बीएनएसएस धारा 174)। इसलिए अगर पुलिस कहे कि आपका मामला असंज्ञेय है, तो रास्ता बंद नहीं होता, बस प्रक्रिया अलग हो जाती है।

एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया: एक-एक कदम

  1. देर न करें। आपात स्थिति में सबसे पहले 112 पर कॉल करें। देरी से मामला खत्म नहीं होता, लेकिन जल्दी दी गई सूचना ज़्यादा भरोसेमंद मानी जाती है और सबूत जुटाने में मदद करती है।
  2. नज़दीकी थाने जाएं। आप किसी भी थाने में जा सकते हैं, भले ही घटना कहीं और हुई हो। पुलिस को ज़ीरो एफआईआर दर्ज करके उसे संबंधित थाने भेजना होगा।
  3. सूचना दें। थाना प्रभारी को घटना बताएँ या लिखित शिकायत सौंपें। तारीख और हस्ताक्षर वाली लिखित शिकायत, जिसकी एक कॉपी आप अपने पास रखें, आमतौर पर सबसे साफ तरीका होता है।
  4. ज़रूरी बातें ज़रूर लिखवाएं। तारीख, समय और जगह; घटना का क्रम; आरोपियों के नाम या पहचान; गवाहों के नाम; चोट या नुकसान का ब्योरा; और आपके पास मौजूद कागज़, फोटो, मैसेज या वीडियो।
  5. लिखी हुई बात जाँचें। अगर आप बोलकर बताते हैं, तो अधिकारी को उसे लिखकर आपको पढ़कर सुनाना होगा। हो सके तो खुद भी पढ़ें। हस्ताक्षर से पहले कोई गलती हो तो सुधरवाएं।
  6. एफआईआर पर हस्ताक्षर करें। तभी हस्ताक्षर करें जब लिखा हुआ आपकी बात से मेल खाता हो।
  7. मुफ्त कॉपी लें। धारा 173(2) के तहत सूचना देने वाले या पीड़ित को एफआईआर की कॉपी मुफ्त मिलती है। एफआईआर नंबर, तारीख और थाने का नाम नोट कर लें।

क्या ऑनलाइन एफआईआर हो सकती है?

हां। बीएनएसएस इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देने की अनुमति देता है, जिसे आम तौर पर ई-एफआईआर कहा जाता है। कई राज्यों की पुलिस अपनी आधिकारिक वेबसाइट या नागरिक पोर्टल पर कुछ तरह की शिकायतें ऑनलाइन लेती है। कौन-सी सुविधा है और किन अपराधों के लिए है, यह हर राज्य में अलग है, इसलिए अपने राज्य की पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

एक नियम खास तौर पर याद रखें: ई-एफआईआर पर सूचना देने वाले को 3 दिन के अंदर हस्ताक्षर करने होते हैं। ऑनलाइन शिकायत के बाद थाने जाकर हस्ताक्षर ज़रूर करें, वरना आपकी सूचना पर आगे कार्रवाई अटक सकती है।

ज़ीरो एफआईआर क्या है?

ज़ीरो एफआईआर का मतलब है कि अपराध चाहे किसी भी इलाके में हुआ हो, पुलिस को आपकी एफआईआर दर्ज करनी होगी और फिर उसे उस थाने को भेजना होगा जिसके क्षेत्र में घटना हुई। इससे आप एक थाने से दूसरे थाने के चक्कर काटने से बचते हैं और सबूत भी नष्ट नहीं होते। अगर कोई अधिकारी कहे कि "यह हमारा इलाका नहीं है", तो शांति से याद दिलाएँ कि कानून अब साफ तौर पर ज़ीरो एफआईआर दर्ज करने को कहता है।

एफआईआर दर्ज होने के बाद क्या होता है?

ज़्यादातर संज्ञेय अपराधों में पुलिस जाँच शुरू करती है: घटनास्थल पर जाती है, बयान दर्ज करती है, सबूत जुटाती है और ज़रूरत पड़ने पर गिरफ्तारी भी कर सकती है।

जिन संज्ञेय अपराधों में 3 साल या उससे ज़्यादा लेकिन 7 साल से कम की सज़ा है, उनमें बीएनएसएस पुलिस को उप पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) रैंक के अधिकारी की अनुमति से 14 दिन के भीतर प्रारंभिक जाँच करने की छूट देता है, ताकि देखा जा सके कि पहली नज़र में मामला बनता है या नहीं। अगर पुलिस बताए कि ऐसी जाँच चल रही है, तो तारीख नोट करें और 14 दिन बाद थाने से पता करें।

सुझाव: एक छोटी फाइल बनाएँ, जिसमें शिकायत की कॉपी, एफआईआर की कॉपी, एफआईआर नंबर, जाँच अधिकारी का नाम और थाने जाने या फोन करने की हर तारीख दर्ज हो। आगे शिकायत ऊपर तक ले जानी पड़े या अदालत को बताना हो, तो यही रिकॉर्ड काम आता है।

अगर पुलिस एफआईआर दर्ज करने से मना करे तो?

अगर थाना प्रभारी संज्ञेय अपराध की एफआईआर दर्ज करने से इनकार करे, तो आप अपनी शिकायत का सार पुलिस अधीक्षक (एसपी) को भेज सकते हैं (धारा 173(4))। इससे भी बात न बने, तो धारा 175(3) के तहत हलफनामे के साथ मजिस्ट्रेट के पास आवेदन किया जा सकता है। हर कदम की जानकारी के लिए पढ़ें: पुलिस एफआईआर दर्ज न करे तो क्या करें।

इन गलतियों से बचें

  • बढ़ा-चढ़ाकर बातें लिखवाना या ऐसे लोगों के नाम जोड़ना जिनके बारे में आप पक्के नहीं हैं। झूठी या बढ़ा-चढ़ाकर लिखी एफआईआर आपके अपने मामले को कमज़ोर कर सकती है।
  • बिना पढ़े, या आपकी बात से अलग लिखे गए बयान पर हस्ताक्षर करना।
  • कॉपी या एफआईआर नंबर लिए बिना थाने से लौट आना।
  • बिना वजह हफ्तों इंतज़ार करना, खासकर जब मेडिकल सबूत या सीसीटीवी फुटेज मिटने का खतरा हो।

न्याय घर कैसे मदद कर सकता है

एफआईआर दर्ज कराना तनाव भरा हो सकता है, खासकर तब जब समझ न आए कि घटना को कैसे लिखें या पुलिस सहयोग न कर रही हो। न्याय घर के ज़रिए आप कानूनी सहायता का अनुरोध कर सकते हैं और किसी योग्य वकील से जुड़ सकते हैं, जो आपकी शिकायत देखकर उसे साफ-साफ लिखने में मदद कर सकते हैं और आगे का रास्ता बता सकते हैं। हमारे आपराधिक कानून सेवा क्षेत्र के बारे में जानें, और यह भी पढ़ें कि गिरफ्तारी के समय आपके क्या अधिकार हैं।

यह मार्गदर्शिका सामान्य कानूनी जानकारी है, आपके विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं।

न्याय घर टीम द्वारा संबंधित अधिनियमों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आधार पर, सामान्य जानकारी के लिए लिखी गई। कानून बदलते रहते हैं, इसलिए कोई कदम उठाने से पहले किसी योग्य अधिवक्ता से वर्तमान स्थिति जान लें।

आधिकारिक स्रोत

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या एफआईआर दर्ज कराने के लिए वकील ज़रूरी है?

नहीं। संज्ञेय अपराध की जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति सीधे पुलिस को सूचना दे सकता है। फिर भी साफ लिखित शिकायत तैयार करने या पुलिस के सहयोग न करने पर वकील मदद कर सकते हैं।

क्या एफआईआर की कॉपी के लिए कोई शुल्क देना होता है?

नहीं। बीएनएसएस की धारा 173(2) के तहत सूचना देने वाले या पीड़ित को एफआईआर की कॉपी मुफ्त दी जाती है।

क्या दूसरे इलाके के थाने में एफआईआर दर्ज हो सकती है?

हां। अपराध कहीं भी हुआ हो, पुलिस को ज़ीरो एफआईआर दर्ज करनी होगी और फिर उसे संबंधित थाने को भेजना होगा।

ऑनलाइन ई-एफआईआर करने के बाद क्या करना होता है?

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी गई सूचना पर 3 दिन के भीतर आपके हस्ताक्षर ज़रूरी हैं। थाने जाकर हस्ताक्षर करें और कॉपी लें, ताकि मामला आगे बढ़े।

इस कानूनी सेवा के बारे में जानें: आपराधिक कानून

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