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पुलिस एफआईआर दर्ज न करे तो क्या करें: आपके कानूनी विकल्प

अगर पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज करने से मना कर दे, तो कानून आगे के साफ रास्ते देता है। जानिए शांति से शिकायत ऊपर कैसे ले जाएँ और रिकॉर्ड कैसे रखें।

न्याय घर टीमप्रकाशित 7 मिनट में पढ़ें

इस मार्गदर्शिका में

अगर पुलिस किसी संज्ञेय अपराध की एफआईआर दर्ज करने से मना करे, तो आपके पास तीन मुख्य कदम हैं। पहला, विनम्रता से ज़ोर दें और लिखित शिकायत दें। दूसरा, बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत शिकायत का सार पुलिस अधीक्षक (एसपी) को भेजें। तीसरा, धारा 175(3) के तहत हलफनामे के साथ मजिस्ट्रेट को आवेदन दें।

क्या पुलिस कानूनी रूप से एफआईआर दर्ज करने से मना कर सकती है?

संज्ञेय अपराध के मामले में आम तौर पर नहीं। ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सूचना से संज्ञेय अपराध का पता चलता है, तो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। पुलिस सिर्फ इसलिए मना नहीं कर सकती कि उसे आपकी बात पर शक है, मामला "छोटा" लगता है या उसे लगता है कि मामला किसी और थाने का है।

हालाँकि कुछ स्थितियों में पुलिस कानूनन अलग रास्ता अपना सकती है:

  • असंज्ञेय अपराध। पुलिस सूचना को रजिस्टर में दर्ज करके आपको मजिस्ट्रेट के पास भेजती है। मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना वह जाँच नहीं कर सकती (बीएनएसएस धारा 174)।
  • प्रारंभिक जाँच। जिन संज्ञेय अपराधों में 3 साल या उससे ज़्यादा लेकिन 7 साल से कम की सज़ा है, उनमें पुलिस उप पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) रैंक के अधिकारी की अनुमति से 14 दिन के भीतर प्रारंभिक जाँच कर सकती है, ताकि देखा जा सके कि पहली नज़र में मामला बनता है या नहीं (बीएनएसएस धारा 173(3))।

अगर इनमें से कोई स्थिति लागू नहीं होती और आपने संज्ञेय अपराध की सूचना दी है, तो पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी चाहिए।

पुलिस के आम बहाने और कानून क्या कहता है

  • "यह हमारा इलाका नहीं है।" बीएनएसएस में ज़ीरो एफआईआर का प्रावधान है: अपराध कहीं भी हुआ हो, पुलिस को सूचना दर्ज करके उसे सही थाने भेजना होगा।
  • "पहले सबूत लाओ।" एफआईआर दर्ज कराने के लिए आपको अपना मामला साबित नहीं करना होता। सबूत जुटाना जाँच का काम है, जो पुलिस करती है।
  • "आपस में सुलझा लो।" पुलिस समझौते की सलाह दे सकती है, लेकिन संज्ञेय अपराध की एफआईआर दर्ज करने के लिए इसे शर्त नहीं बना सकती।
  • "बस एक अर्ज़ी दे दो, देख लेंगे।" अगर सूचना से संज्ञेय अपराध बनता है, तो सिर्फ अर्ज़ी लेकर रख लेना और एफआईआर दर्ज न करना कानून की माँग पूरी नहीं करता।

पुलिस एफआईआर दर्ज न करे तो क्या करें: एक-एक कदम

  1. शांत रहें और सब लिखित में दें। तारीख, समय, जगह, घटना और शामिल लोगों के ब्योरे के साथ साफ शिकायत लिखें। उस पर हस्ताक्षर करें और एक कॉपी अपने पास रखें।
  2. पावती माँगें। अपनी कॉपी पर थाने की मुहर या हस्ताक्षर से पावती लेने का अनुरोध करें। जिस अधिकारी से बात हुई उसका नाम, पद और थाने जाने का समय नोट करें।
  3. विनम्रता से कानून का हवाला दें। बताएँ कि आपकी सूचना से संज्ञेय अपराध बनता है और बीएनएसएस धारा 173 व ललिता कुमारी फैसले के अनुसार एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। आपात स्थिति में 112 पर कॉल करें।
  4. पुलिस अधीक्षक को लिखें। धारा 173(4) के तहत आप अपनी सूचना का सार लिखित रूप में एसपी को भेज सकते हैं (कुछ शहरों में यह भूमिका पुलिस उपायुक्त यानी डीसीपी निभाते हैं)। इसे रजिस्टर्ड पोस्ट या स्पीड पोस्ट से भेजें, या एसपी कार्यालय में जमा करके रसीद लें। अगर एसपी को लगे कि संज्ञेय अपराध बनता है, तो वे खुद जाँच कर सकते हैं या किसी अधीनस्थ अधिकारी को जाँच का निर्देश दे सकते हैं।
  5. मजिस्ट्रेट को आवेदन दें। अगर एसपी भी कार्रवाई न करें, तो आप बीएनएसएस धारा 175(3) (पुरानी सीआरपीसी धारा 156(3)) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट को आवेदन दे सकते हैं। आवेदन के साथ हलफनामा ज़रूरी है, और यह दिखाना चाहिए कि आप पहले एसपी के पास जा चुके हैं। मजिस्ट्रेट पुलिस को एफआईआर दर्ज करके जाँच का आदेश दे सकते हैं।
  6. हर कागज़ संभालकर रखें। शिकायत, पावती, डाक की रसीदें, एसपी को भेजे पत्र और आवेदन की कॉपियाँ इस बात का सबूत हैं कि आपने हर कदम उठाया।

सावधानी: मजिस्ट्रेट के पास तभी जाएँ जब आप थाना प्रभारी और एसपी दोनों से संपर्क कर चुके हों, और दोनों का सबूत आपके पास हो। धारा 175(3) का आवेदन तब ज़्यादा मज़बूत होता है जब उसमें दिखे कि पहले के रास्ते आज़माए गए और काम नहीं आए।

एसपी को भेजे पत्र में क्या लिखें?

पत्र छोटा और तथ्यों पर आधारित रखें। इसमें शामिल करें:

  • आपका नाम, पता और फोन नंबर
  • घटना की तारीख, समय और जगह
  • सीधी भाषा में घटना का ब्योरा और शामिल लोग
  • आप किस थाने गए, किस तारीख को गए और वहाँ क्या कहा गया
  • एफआईआर दर्ज करने और जाँच करने का अनुरोध
  • साथ लगे दस्तावेज़ों की सूची, जैसे मूल शिकायत की कॉपी, मेडिकल कागज़ या फोटो

भावनात्मक भाषा और ऐसे आरोपों से बचें जिन्हें आप साबित न कर सकें। शांत और व्यवस्थित पत्र पर वरिष्ठ अधिकारी के लिए कार्रवाई करना आसान होता है।

मजिस्ट्रेट के पास जाने पर क्या होता है?

मजिस्ट्रेट आपका आवेदन, हलफनामा और आपके द्वारा उठाए गए पिछले कदम देखते हैं। वे पुलिस अधिकारी का पक्ष भी सुन सकते हैं। संतुष्ट होने पर वे पुलिस को एफआईआर दर्ज करके जाँच का निर्देश दे सकते हैं। प्रक्रिया, फ़ॉर्म और लगने वाला समय अलग-अलग अदालतों और राज्यों में अलग होता है, इसलिए आवेदन और हलफनामा किसी वकील से तैयार करवाना मददगार रहता है।

धारा 175(3) के अलावा आप सीधे मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत (परिवाद) भी दायर कर सकते हैं, जिसमें मजिस्ट्रेट आपकी और आपके गवाहों की जाँच कर सकते हैं। आपके लिए कौन-सा रास्ता सही है, यह तथ्यों पर निर्भर करता है, इसलिए चुनने से पहले सलाह ज़रूर लें।

अगर अपराध असंज्ञेय हो तो?

अगर अधिकारी कहे कि आपका मामला असंज्ञेय है, तो उसे थाने के रजिस्टर में दर्ज करवाएँ और एंट्री का ब्योरा नोट करें। इसके बाद आप मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं, जो धारा 174 के तहत पुलिस को जाँच का आदेश दे सकते हैं। असंज्ञेय अपराध भी अपराध ही है; बस पुलिस जाँच से पहले अदालत की अनुमति चाहिए।

सबसे पहले अपनी सुरक्षा

अगर आपको धमकियाँ मिल रही हैं या तुरंत खतरा है, तो एफआईआर की प्रक्रिया पूरी होने का इंतज़ार किए बिना 112 पर कॉल करें। किसी भरोसेमंद व्यक्ति को स्थिति बताएँ और सभी कागज़ों की कॉपियाँ एक से ज़्यादा जगह रखें।

न्याय घर कैसे मदद कर सकता है

जब पुलिस कार्रवाई न करे, तब एसपी को अच्छी तरह लिखा पत्र या मजिस्ट्रेट को सही ढंग से तैयार आवेदन बड़ा फर्क ला सकता है। न्याय घर के ज़रिए आप कानूनी सहायता का अनुरोध कर सकते हैं और किसी योग्य वकील से जुड़ सकते हैं, जो आपके तथ्य देखकर शिकायत तैयार कर सकते हैं और मजिस्ट्रेट के सामने आपका पक्ष रख सकते हैं। हमारे आपराधिक कानून सेवा क्षेत्र को देखें, और पढ़ें कि एफआईआर कैसे दर्ज करें।

यह मार्गदर्शिका सामान्य कानूनी जानकारी है, आपके विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं।

न्याय घर टीम द्वारा संबंधित अधिनियमों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आधार पर, सामान्य जानकारी के लिए लिखी गई। कानून बदलते रहते हैं, इसलिए कोई कदम उठाने से पहले किसी योग्य अधिवक्ता से वर्तमान स्थिति जान लें।

आधिकारिक स्रोत

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है?

हाँ, जब सूचना से संज्ञेय अपराध का पता चलता हो। सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) में यही कहा है, हालाँकि अब बीएनएसएस धारा 173(3) में सीमित प्रारंभिक जाँच की छूट है।

क्या पुलिस के मना करने पर सीधे मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं?

बीएनएसएस के अनुसार पहले धारा 173(4) के तहत एसपी से संपर्क करना चाहिए। धारा 175(3) के आवेदन में यह कदम दिखना चाहिए और साथ में हलफनामा होना चाहिए।

बीएनएसएस की धारा 175(3) क्या है?

इसके तहत मजिस्ट्रेट पुलिस को किसी संज्ञेय अपराध की जाँच का आदेश दे सकते हैं। यह पुरानी सीआरपीसी की धारा 156(3) की जगह आई है।

क्या पुलिस एफआईआर की जगह समझौता करने को कह सकती है?

पुलिस समझौते की सलाह दे सकती है, लेकिन संज्ञेय अपराध में सिर्फ इसलिए एफआईआर से इनकार नहीं कर सकती कि आप समझौता नहीं चाहते।

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