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न्याय घर

पारिवारिक कानून

विवाह, अलगाव, बच्चों और पारिवारिक संपत्ति से जुड़े मामलों में मार्गदर्शन।

ज़रूरी समय-सीमाएँ और नंबर

1 साल
अलग रहने की अवधि
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत आपसी सहमति की याचिका से पहले ज़रूरी।
6 महीने
दोनों अर्ज़ियों के बीच का समय
पहली अर्ज़ी के छह महीने बाद दूसरी दी जाती है। उचित मामलों में अदालत यह अवधि माफ़ कर सकती है।
18 महीने
दूसरी अर्ज़ी की अंतिम सीमा
दूसरी अर्ज़ी पहली याचिका के 18 महीने के भीतर दी जानी चाहिए।

परिचय

पारिवारिक कानून शादी, अलगाव, तलाक, भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी और परिवार में विरासत से जुड़ा है। भारत में इनमें से कई सवालों का जवाब इस पर निर्भर करता है कि आप पर कौन-सा व्यक्तिगत कानून लागू होता है, जैसे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या पारसी कानून, या फिर सिविल विवाह के लिए विशेष विवाह अधिनियम।

इस क्षेत्र में क्या-क्या आता है

इस क्षेत्र में लोग अक्सर इस तरह के मामले लेकर हमारे पास आते हैं।

  • आपसी सहमति से तलाक

    जब पति-पत्नी दोनों अलग होना चाहें तब की प्रक्रिया, जिसमें भरण-पोषण, कस्टडी और स्त्रीधन का निपटारा भी शामिल है।

  • विवादित तलाक और अलगाव

    जब एक पक्ष सहमत न हो तब क्या लागू होता है, और विवाह पर लागू व्यक्तिगत कानून के आधार।

  • भरण-पोषण

    खुद का खर्च न चला पाने वाली पत्नी, बच्चों या माता-पिता के दावे, जिनमें अंतरिम भरण-पोषण भी शामिल है।

  • बच्चों की कस्टडी और मुलाकात

    अलगाव के बाद की व्यवस्था, जिसे अदालत बच्चे के हित को देखकर तय करती है।

  • घरेलू हिंसा से सुरक्षा

    घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत संरक्षण, निवास और आर्थिक राहत के आदेश।

  • स्त्रीधन और विरासत

    महिला की अपनी संपत्ति वापस पाना, और किसी के निधन के बाद पारिवारिक संपत्ति किसे मिलती है।

कब मदद की ज़रूरत पड़ सकती है

इनमें से कुछ भी जाना-पहचाना लगे, तो जल्दी मार्गदर्शन लेना मददगार हो सकता है।

  • आप और आपके जीवनसाथी आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते हैं
  • घर में आपके साथ शारीरिक, मानसिक या आर्थिक हिंसा हो रही है
  • आपको अपने, बच्चों के या बुज़ुर्ग माता-पिता के लिए भरण-पोषण चाहिए
  • आप अलग रह रहे हैं और बच्चे की कस्टडी या मुलाकात को लेकर स्पष्टता चाहिए

मामला आमतौर पर कैसे आगे बढ़ता है

यह घटनाओं का सामान्य क्रम है। तथ्यों और आपके राज्य के अनुसार आपका मामला अलग हो सकता है।

  1. 1

    सुरक्षा और तुरंत की ज़रूरतें

  2. 2

    काउंसलिंग या मध्यस्थता

  3. 3

    याचिका या आवेदन

  4. 4

    अंतरिम आदेश

  5. 5

    समझौता या अंतिम आदेश

न्याय घर कैसे मदद करता है

अपनी बात बताने के बाद आप हमारी टीम से क्या उम्मीद कर सकते हैं।

  • पहले आपकी बात

    हम आपको अपने शब्दों और अपनी भाषा में पूरी बात कहने का मौका देते हैं।

  • विकल्पों की जानकारी

    मध्यस्थता, आपसी सहमति से तलाक, भरण-पोषण का दावा और संरक्षण आदेश जैसे रास्ते हम सरल भाषा में समझाते हैं।

  • सुरक्षा सबसे पहले

    अगर आप खतरे में हैं, तो हम सबसे पहले आपको आपातकालीन नंबर 112 और महिला हेल्पलाइन 181 जैसी तुरंत मदद की ओर भेजते हैं।

  • वकील से संपर्क

    जहाँ अदालती कार्यवाही ज़रूरी हो, वहाँ हम आपको पारिवारिक मामलों के अनुभवी वकील से जोड़ते हैं।

ये दस्तावेज़ तैयार रखें

ये सब होना ज़रूरी नहीं। जो आपके पास है, वही बताएँ।

  • विवाह प्रमाणपत्र, या शादी का कार्ड और तस्वीरें
  • बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र
  • पति-पत्नी दोनों की आय के सबूत, जैसे सैलरी स्लिप, आयकर रिटर्न और बैंक स्टेटमेंट
  • स्त्रीधन और उपहारों की सूची, जहाँ हो सके तस्वीरों या रसीदों के साथ

इन गलतियों से बचें

छोटी-छोटी चूकें, जो बाद में मामले को मुश्किल बना सकती हैं।

  • स्त्रीधन, भरण-पोषण और कस्टडी साफ़ लिखे बिना समझौते पर दस्तखत करना
  • जहाँ सुरक्षित हो, वहाँ भी ज़रूरी कागज़ों की प्रतियों के बिना घर छोड़ना
  • हिंसा का कोई रिकॉर्ड न रखना, जैसे मेडिकल रिपोर्ट, तस्वीरें या मैसेज
  • आय या संपत्ति छिपाना, क्योंकि अदालत संपत्ति और देनदारियों का शपथ पत्र माँग सकती है

आमतौर पर लागू होने वाले कानून

इस क्षेत्र से जुड़े मुख्य कानून, आसान भाषा में।

  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955

  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954

  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005

सामान्य प्रश्न

हर स्थिति अलग होती है। ये पृष्ठ इस क्षेत्र को सामान्य रूप से समझाते हैं; आपके मामले की समीक्षा उसके अपने तथ्यों के आधार पर होगी।

आपसी सहमति से तलाक में कितना समय लगता है?

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत पति-पत्नी का कम से कम एक साल से अलग रहना ज़रूरी है। पहली अर्ज़ी के छह महीने बाद दूसरी अर्ज़ी दी जाती है, हालाँकि उचित मामलों में अदालत यह प्रतीक्षा अवधि माफ़ कर सकती है।

क्या तलाक लिए बिना भरण-पोषण माँगा जा सकता है?

हाँ। जो पत्नी अपना खर्च नहीं चला सकती, वह शादी कायम रहते हुए भी बीएनएसएस की धारा 144, घरेलू हिंसा अधिनियम या अपने व्यक्तिगत कानून के तहत भरण-पोषण माँग सकती है, और केस चलने के दौरान अदालत अंतरिम भरण-पोषण दे सकती है।

क्या घरेलू हिंसा कानून सिर्फ़ पत्नियों के लिए है?

नहीं। यह साझा घर में घरेलू रिश्ते में रह रही हर महिला की रक्षा करता है, जिसमें माँ, बहन, विधवा और विवाह जैसे रिश्ते में रह रही महिलाएँ भी शामिल हैं।

क्या बेटी का पैतृक संपत्ति में हिस्सा होता है?

2005 में संशोधित हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटी जन्म से सहदायिक है और उसके अधिकार बेटे के बराबर हैं। दूसरे व्यक्तिगत कानूनों के अपने नियम हैं।

समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहाँ से करें? हमें बताइए क्या हुआ।

अपनी समस्या अपने शब्दों में लिखें। हमारी टीम उसे पढ़कर आपसे संपर्क करेगी।

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