इस मार्गदर्शिका में
भारत में जमानत कैसे मिलेगी, यह अपराध की प्रकृति पर निर्भर करता है। जमानती अपराध में जमानत आपका अधिकार है और जमानत देने पर पुलिस या अदालत को आपको छोड़ना होगा (बीएनएसएस धारा 478)। गैर-जमानती अपराध में फैसला अदालत करती है। गिरफ्तारी की आशंका हो तो सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत माँगी जा सकती है।
जमानत क्या है?
जमानत का मतलब है कि मुकदमा चलते रहने के दौरान आरोपी को हिरासत से इस वादे पर रिहा किया जाए कि वह हर बुलावे पर हाज़िर होगा। यह वादा आम तौर पर एक बॉन्ड (मुचलके) के ज़रिए किया जाता है, और कई बार एक या ज़्यादा जमानतदार भी देने होते हैं, जो आपकी हाज़िरी की गारंटी लेते हैं। जमानत मिलना बेगुनाही का फैसला नहीं है, और जमानत न मिलना दोष साबित होना नहीं है। इससे सिर्फ यह तय होता है कि फैसले तक आप घर पर रहेंगे या हिरासत में।
1 जुलाई 2024 से जमानत के नियम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में हैं, जिसने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की जगह ली है। धाराओं के नंबर बदले हैं, लेकिन मूल सिद्धांत लगभग वही हैं।
जमानती और गैर-जमानती अपराध
सबसे पहला सवाल यही होता है कि अपराध जमानती है या गैर-जमानती। हर अपराध के लिए यह कानून में तय है, और आपकी एफआईआर या गिरफ्तारी मेमो में धाराएँ लिखी होती हैं।
- जमानती अपराध: जमानत आपका अधिकार है। अगर आप जमानत देने को तैयार हैं, तो पुलिस अधिकारी या अदालत को आपको रिहा करना होगा (बीएनएसएस धारा 478, पुरानी सीआरपीसी धारा 436)। गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को यह भी बताना होता है कि आप जमानत पर रिहा होने के हकदार हैं (बीएनएसएस धारा 47)।
- गैर-जमानती अपराध: जमानत देना अदालत के विवेक पर है (बीएनएसएस धारा 480, पुरानी सीआरपीसी धारा 437)। अदालत आरोप की गंभीरता, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत, आरोपी के फरार होने की आशंका और सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने के खतरे जैसी बातों पर विचार करती है।
सत्र न्यायालय और हाईकोर्ट के पास जमानत देने की विशेष शक्तियाँ हैं, जिनमें गंभीर मामलों में जमानत देना और निचली अदालत की लगाई शर्तों में बदलाव करना शामिल है (बीएनएसएस धारा 483, पुरानी सीआरपीसी धारा 439)।
नियमित जमानत कैसे लें: एक-एक कदम
- धाराओं की जानकारी लें। एफआईआर और गिरफ्तारी मेमो की कॉपी लें, और देखें कि कौन-से अपराध लगाए गए हैं और वे जमानती हैं या नहीं।
- जल्द से जल्द वकील से बात करें। अगर आप वकील का खर्च नहीं उठा सकते, तो आपको मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार है; अदालत या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण वकील उपलब्ध करा सकता है।
- जमानत अर्ज़ी दाखिल करें। ज़्यादातर मामलों में पहली अर्ज़ी मजिस्ट्रेट के सामने लगती है। गंभीर अपराधों में, या मजिस्ट्रेट के इनकार के बाद, अर्ज़ी सत्र न्यायालय और फिर हाईकोर्ट में जाती है।
- ज़रूरी कागज़ तैयार रखें। पहचान और पते का प्रमाण, परिवार और रोज़गार का ब्योरा, कोई मेडिकल रिकॉर्ड, और ऐसी कोई भी बात जो दिखाए कि आप फरार नहीं होंगे।
- ज़रूरत हो तो जमानतदार का इंतज़ाम करें। जमानतदार आम तौर पर कोई रिश्तेदार या परिचित होता है, जो बॉन्ड पर हस्ताक्षर करता है और जिसे पहचान व संपत्ति या आय के कागज़ दिखाने पड़ सकते हैं। ये शर्तें अलग-अलग अदालतों में अलग हो सकती हैं।
- सुनवाई में मौजूद रहें। अभियोजन पक्ष अर्ज़ी का विरोध कर सकता है। अदालत शर्तों के साथ जमानत दे सकती है या अर्ज़ी खारिज कर सकती है।
- शर्तों का पालन करें। इनमें हर तारीख पर पेश होना, बिना अनुमति शहर या देश न छोड़ना, पासपोर्ट जमा करना या गवाहों से संपर्क न करना शामिल हो सकता है। शर्तें तोड़ने पर जमानत रद्द हो सकती है।
अग्रिम जमानत क्या है?
अग्रिम जमानत अदालत का ऐसा निर्देश है कि अगर किसी खास मामले में आपको गिरफ्तार किया जाए, तो आपको जमानत पर छोड़ दिया जाएगा। इसके लिए आप गिरफ्तारी से पहले अर्ज़ी देते हैं, जब आपके पास यह मानने का कारण हो कि किसी गैर-जमानती अपराध में आपकी गिरफ्तारी हो सकती है।
बीएनएसएस धारा 482 (पुरानी सीआरपीसी धारा 438) के तहत यह अर्ज़ी सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट में दी जा सकती है। अदालत आरोप की प्रकृति, आपकी पृष्ठभूमि और यह देखती है कि कहीं आरोप आपको नुकसान पहुँचाने या अपमानित करने के इरादे से तो नहीं लगाए गए। अदालत शर्तें लगा सकती है, जैसे पूछताछ के लिए उपलब्ध रहना, गवाहों को न धमकाना और बिना अनुमति भारत से बाहर न जाना।
अग्रिम जमानत के बारे में कब सोचें?
- जब आपको पुलिस का नोटिस मिला हो या पता चले कि आपके नाम से एफआईआर दर्ज हुई है
- जब कोई पारिवारिक, संपत्ति या कारोबारी विवाद आपके खिलाफ आपराधिक शिकायत में बदल गया हो
- जब गिरफ्तारी का डर किसी ठोस और साफ वजह से हो, सिर्फ अनुमान से नहीं
अर्ज़ी जल्दी लगाएँ और अगर आपके पास एफआईआर या शिकायत की कॉपी हो, तो उसे साथ लगाएं। अर्ज़ी लंबित रहने के दौरान पुलिस के नोटिस को नज़रअंदाज़ न करें; पेशी के बारे में अपने वकील की सलाह मानें।
डिफ़ॉल्ट जमानत: जब पुलिस समय पर चार्जशीट न दे
अगर आप हिरासत में हैं और पुलिस तय समय सीमा में जाँच पूरी करके चार्जशीट दाखिल नहीं करती, तो आप डिफ़ॉल्ट जमानत के हकदार हो जाते हैं। यह सीमा अपराध के अनुसार 60 या 90 दिन है (बीएनएसएस धारा 187, पुरानी सीआरपीसी धारा 167(2))।
यह अधिकार खुद माँगना पड़ता है। जैसे ही समय सीमा खत्म हो और चार्जशीट दाखिल न हुई हो, वकील को तुरंत रिहाई की अर्ज़ी देनी चाहिए। अगर अर्ज़ी से पहले चार्जशीट दाखिल हो गई, तो यह खास रास्ता हाथ से निकल सकता है, इसलिए समय बहुत अहम है।
सुझाव: पहली रिमांड की तारीख कैलेंडर पर लिख लें और वहाँ से 60 और 90 दिन गिनकर निशान लगा लें। अपने वकील से पहले ही पूछ लें कि आपके मामले में कौन-सी सीमा लागू है, ताकि डिफ़ॉल्ट जमानत की अर्ज़ी समय पर लग सके।
लंबे समय से बंद विचाराधीन कैदियों की रिहाई
कई लोग मुकदमा शुरू होने से पहले ही लंबे समय तक जेल में रहते हैं। बीएनएसएस धारा 479 के तहत, जिस विचाराधीन कैदी ने उस अपराध की अधिकतम सज़ा का आधा समय हिरासत में बिता लिया हो, उसे जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए। जिसे पहले कभी किसी अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया, उसे एक-तिहाई समय के बाद बॉन्ड पर रिहा किया जा सकता है। मृत्युदंड या उम्रकैद वाले अपराधों पर यह लागू नहीं होता, और आम तौर पर एक से ज़्यादा अपराध या मामले लंबित होने पर भी नहीं। अभियोजक को सुनकर अदालत हिरासत बढ़ा भी सकती है। अगर परिवार का कोई सदस्य लंबे समय से हिरासत में है, तो वकील या जेल के लीगल एड क्लिनिक से पूछें कि यह प्रावधान लागू होता है या नहीं।
अगर जमानत खारिज हो जाए तो?
खारिज होना आखिरी फैसला नहीं है। आम तौर पर आप ऊंची अदालत में फिर अर्ज़ी दे सकते हैं, जैसे मजिस्ट्रेट के बाद सत्र न्यायालय और फिर हाईकोर्ट। उसी अदालत में नई अर्ज़ी के लिए आम तौर पर परिस्थितियों में बदलाव ज़रूरी होता है, जैसे चार्जशीट दाखिल हो जाना या लंबे समय तक हिरासत में रहना।
न्याय घर कैसे मदद कर सकता है
जमानत के मामलों में चीज़ें तेज़ी से बदलती हैं, और सही समय पर लगाई गई सही अर्ज़ी फर्क ला सकती है। न्याय घर के ज़रिए आप कानूनी सहायता का अनुरोध कर सकते हैं और किसी योग्य वकील से जुड़ सकते हैं, जो एफआईआर देखकर बता सकते हैं कि अपराध जमानती है या नहीं और नियमित या अग्रिम जमानत की अर्ज़ी तैयार कर सकते हैं। हमारे आपराधिक कानून सेवा क्षेत्र को देखें, और पढ़ें गिरफ्तारी के समय आपके अधिकार और मुफ्त कानूनी सहायता के बारे में।
यह मार्गदर्शिका सामान्य कानूनी जानकारी है, आपके विशेष मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं।
न्याय घर टीम द्वारा संबंधित अधिनियमों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आधार पर, सामान्य जानकारी के लिए लिखी गई। कानून बदलते रहते हैं, इसलिए कोई कदम उठाने से पहले किसी योग्य अधिवक्ता से वर्तमान स्थिति जान लें।
आधिकारिक स्रोत
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या पुलिस जमानत दे सकती है या सिर्फ अदालत?
जमानती अपराध में थाना प्रभारी जमानत लेकर आपको रिहा कर सकते हैं। गैर-जमानती अपराध में जमानत का फैसला आम तौर पर अदालत करती है।
अग्रिम जमानत कौन दे सकता है?
बीएनएसएस धारा 482 के तहत केवल सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट अग्रिम जमानत दे सकते हैं। मजिस्ट्रेट अग्रिम जमानत नहीं दे सकते।
डिफ़ॉल्ट जमानत क्या होती है?
अगर पुलिस अपराध के अनुसार 60 या 90 दिन में चार्जशीट दाखिल न करे, तो बीएनएसएस धारा 187 के तहत आरोपी जमानत का हकदार हो जाता है। इसके लिए चार्जशीट दाखिल होने से पहले अर्ज़ी देनी होती है।
क्या जमानत मिलने से केस खत्म हो जाता है?
नहीं। जमानत का मतलब सिर्फ इतना है कि मुकदमा चलने तक आप हिरासत से बाहर रहेंगे। आपको शर्तें माननी होंगी और हर तारीख पर अदालत में पेश होना होगा।
अपनी स्थिति में मदद चाहिए?
हर मामला अलग होता है। हमें बताइए क्या हुआ, हमारी टीम उसकी समीक्षा कर आपको सही अगले कदम की ओर मार्गदर्शन देगी।




